अन्जानी राहोपे कांटे भी थे और फुल भी
पत्थर भी थे और बेहद डरावने भी
कुच ख्वाबोन्के इशारे भी थे
और कुच दिलकश नजारे भी थे
जाने किन हालातो पे निर्भर होगा ये सफर
हर मंझील अलग और मुश्कील हर डगर
अजीब कश्मकश मे डुबे शामो सहर
ना मिली राहे तो भटके दर बदर
क्या हर इन्सान को राह मिलनी जरुरी है?
क्या हर इन्सान को ठोकर खानी जरुरी है ?
खुदाकी आज़माइश का भी कोई जवाब नही
यहा हर राही मंजिल से क्यू दूर है?
शायद यही तो दुनिया का दस्तूर है
जिसको मिलती मंजिल वो बेखबर है
नेकी कि मिलती नही कोई भी मिसाल अब
क्युंकी बेरुखी हि सबसे ज्यादा जरूर है
अन्जानी राहे क्या कभी होगी जानी पहचानी ?
क्या कभी खुशिया हमारी राहो मे है आनी ?
अब तो बस जिंदगी यु हि है सतानी
अन्जानी राहोपे....
अब तो बस जिंदगी यु हि है सतानी
अन्जानी राहोपे....
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